September 3, 2011

वैवाहिक सप्तपदी (वर-वचन)

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पढ़ने के लिए बहुत दिनों से सँजो कर रखी अपने प्रिय चिट्ठों की फीड देखते-देखते वाणी जी की एक प्रविष्टि पर टिप्पणी करने चला । उस प्रविष्टि में वैवाहिक सप्तपदी का उल्लेख था, सरल हिन्दी में उसे प्रस्तुत करने की चेष्टा भी । इस वैवाहिक सप्तपदी को हिन्दी-काव्य रूप में सुनने पढ़ने की इच्छा से बाबूजी के पास पहुँचा । बाबूजी ने मेरी प्रार्थना स्वीकार कर इसे हिन्दी काव्य-रूप दिया जो सुनने और समझने की दृष्टि से अत्यन्त सहज और प्रिय लगा  मुझे । इस पूरी वैवाहिक सप्तपदी (वर-कन्या वचन) को आप के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ । पिछली प्रविष्टि  में कन्या-वचन की प्रस्तुति बाद आज वर-वचन । आभार ।

वर-वचन

हौं गृह-ग्राम रहौं जब लौं तब लौं ही तू साज सिंगार सजौगी ।
भाँतिन-भाँति के हास-विलास कुतूहल क्रीड़ा में राग रचौगी ।
पै न रहूँ घर तो न अभूषण पेन्होगी तूँ परधाम रहोगी ।
प्रानप्रिये ये करो प्रन तूँ हमरी पहली बतिया न तजौगी ॥१॥

श्री हरि विष्णु चतुर्भुज अग्नि औ ब्राह्मण देव की साक्षी गहौगी ।
वान्धव-बंधु जे मंडप राजत औ ध्रुवतारा की ओट लहौगी ।
ये हरि पावक भूसुर बान्धव औ ध्रुव पाँचो की साख रखोगी ।
प्रानप्रिये ये करो प्रन तूँ हमरी दुसरी बतिया न तजौगी ॥२॥

जीवनसंगिनि, तूँ निज चित्त को मेरे हि चित्त में जोरि रखोगी ।
मेरे ही तूँ मन के अनुकूल रहोगी नहीं प्रतिकूल बहोगी ।
टारोगी नाहिं कहा हमरो तुम सुन्दरि मेरी ही बाट गहौगी ।
प्रानप्रिये ये करो प्रन तूँ हमरी तिसरी बतिया न तजौगी ॥३॥

जा बिधि होय हमें परितोष सोई हृदयेश्वरि काज करौगी ।
लीन रहौगी तूँ मेरी ही भक्ति में मेरी ही नित्य तूँ तृप्ति चहौगी ।
आदर में हमरे न कुटुम्बिन की तूँ कबौं कोतहाई करौगी ।
प्रानप्रिये ये करो प्रन तूँ हमरी चौथी बतिया न तजौगी ॥४॥

भामिनि, साँचहि साँच कहौं मोरि बातिन को तूँ सचेत सुनौगी ।
सूनो लगै घरनी के बिना घर शांति वहीं तूँ जहाँ पै रहौगी ।
’पंकिल’ नैनन की पुतरी बिसवास करौ मेरो बाम गहौगी ।
प्रानप्रिये ये करो प्रन तूँ हमरी पचईं बतिया न तजौगी ॥५॥

September 2, 2011

वैवाहिक सप्तपदी (कन्या-वचन)

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आज पढ़ने के लिए बहुत दिनों से सँजो कर रखी अपने प्रिय चिट्ठों की फीड देखते-देखते वाणी जी की एक प्रविष्टि पर टिप्पणी करने चला । उस प्रविष्टि में वैवाहिक सप्तपदी का उल्लेख था, सरल हिन्दी में उसे प्रस्तुत करने की चेष्टा भी । इस वैवाहिक सप्तपदी को हिन्दी-काव्य रूप में सुनने पढ़ने की इच्छा से बाबूजी के पास पहुँचा । बाबूजी ने मेरी प्रार्थना स्वीकार कर इसे हिन्दी काव्य-रूप दिया जो सुनने और समझने की दृष्टि से अत्यन्त सहज और प्रिय लगा  मुझे । इस पूरी वैवाहिक सप्तपदी (वर-कन्या वचन) को आप के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ । वाणी जी की प्रविष्टि पर टिप्पणी का मसला भी हल हो गया इससे । आभार । 

कन्या-वचन

देवनि देवि अनेकन पूजि कियो जग जीवन पुण्य घना ।
निज अर्चन वंदन पुण्य-प्रताप ते पायौ तुम्हें अब हौं सजना ।
तुम सौम्य सदा रहना जो गृहस्थ को जीवन हौ दुख-सुक्ख सना ।
तब बाम तुम्हारे बिराजुंगी मैं, सजना हमरी पहली बचना ॥१॥

बावलि कूप तड़ाग परिक्रम यज्ञ महोत्सव की रचना ।
सब होत गृहस्थ को धर्मधरा पर जो कछु कर्म करो अपना ।
बिन राय लिए हमरी न करो कछु ख्याल सदा यहि को रखना ।
तब बाम तुम्हारे बिराजुंगी मैं, सजना हमरी दूसरी बचना ॥२॥

व्रत कर्म उदापन दान विधान की जो कछु शास्त्रन में गणना ।
इनमें रमता मन नारिन को ये सुभाव विधाता ने दीन्हीं बना ।
इनको मत भंग कभी करना पिय क्रोध उलाहन से बचना ।
तब बाम तुम्हारे बिराजुंगी मैं, सजना हमरी तिसरी बचना ॥३॥

पुरुषारथ से उपराजन जो करिहौ अपनो धन धान्य धना ।
गज बाजि औ गोधन को पशु वैभव जो कुल बीच वितान बना ।
सोइ सारी कमाई जुटाई पिया तुम मोरेहिं हाथन पै रखना ।
तब बाम तुम्हारे बिराजुंगी मैं, सजना हमरी चउथी बचना ॥४॥

तू पिय जो पशु हाट में गोधन जइहौ खरीदन जोरी बना ।
किनको चुनिबो किनको रखिबो किन बेचनि की करिहौं गणना ।
सब पूछिके मोसे करोगे, उल्लंघन ना करिहौ हमरो कहना ।
तब बाम तुम्हारे बिराजुंगी मैं, सजना हमरी पँचवी बचना ॥५॥

हीरक मोतिहुँ सोन औ चानी को जो बहु भाँति बन्यो गहना ।
सब अंगनि-अंगनि साज सजाई बिबाह कौ आज रच्यौ रचना ।
इनको मत लेना उतार कभी प्रिय अंग चढ़्यौ जो तेरौ गहना ।
तब बाम तुम्हारे बिराजुंगी मैं, सजना हमरी छठईं बचना ॥६॥

मंगल काज कबौं करिहैं जब भाई घरे बचनी-बचना ।
बिन बोले भी मैं पहुँचूँगी तहाँ पिय लै अपनो बँधनी-बँधना ।
अपमानित तूँ करना मत ’पंकिल’ लाज मेरे मन की रखना ।
तब बाम तुम्हारे बिराजुंगी मैं, सजना हमरी सतईं बचना ॥७॥


’वर-वचन’ अगली प्रविष्टि में-----

August 29, 2011

सौन्दर्य लहरी-6

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’सौन्दर्य-लहरी’ संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है । आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य । निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है ’सौन्दर्य-लहरी’ में । उत्कंठावश इसे पढ़ना शुरु किया था, सुविधानुसार शब्दों के अर्थ लिखे, मन की प्रतीति के लिये सस्वर पढ़ा, और भाव की तुष्टि के लिये हिन्दी में इसे अपने ढंग से गढ़ा । अब यह आपके सामने प्रस्तुत है । ’तर्तुं उडुपे नापि सागरम्’ - सा प्रयास है यह । अपनी थाती को संजो रहे बालक का लड़कपन भी दिखेगा इसमें । सो इसमें न कविताई ढूँढ़ें, न विद्वता । मुझे उचकाये जाँय, उस तरफ की गली में बहुत कुछ अपना अपरिचित यूँ ही छूट गया है । उमग कर चला हूँ, जिससे परिचित होउँगा, उँगली पकड़ आपके पास ले आऊँगा । जो सहेजूँगा, यहाँ लाकर रख दूँगा । साभार। पहली , दूसरी , तीसरी, चौथी, पाँचवीं कड़ी के बाद आज छठीं कड़ी --
सौन्दर्य लहरी के यह रूपान्तरित छन्द पहले मुक्त छन्द में लिखने शुरु किए थे । बाद में अमरेन्द्र के उचकाने पर छ्न्दबद्ध लिखने का प्रयास दूसरी प्रविष्टि में दिखा आपको । टिप्पणियाँ, मेल इनबॉक्स-दोनों ने छन्दबद्ध रूप से ज्यादा छन्दमुक्त रूप को सराहा । प्रयास तो यही था कि नियमित तीन चार छन्दों की प्रस्तुति से इस ग्रंथ को सम्पूर्णतः प्रस्तुत कर दूँगा, पर अनगिन व्यतिरेकों ने राह रोकी, मैं ठहरा ही रह गया । एकांत के क्षण जब खूब सघन होकर चेतना पर छा गए तो पुनः इस लहरी का सौन्दर्य स्मरण में आया । मैं सायास उपस्थित हूँ इन छन्दों को प्रस्तुत करने के लिए । ढंग वही मुक्त छंदी, आपको रुचिकर लगेगा, इसलिए ।
मुखं बिंदुं कृत्वा कुचयुगमधस्तस्य तदधो
हरार्ध ध्यायेद्यो हरमहिषि ते मन्मथकलाम् ।
स सद्यः संक्षोभं नयति वनिता इत्यति लघु
त्रिलोकीमप्याशु भ्रमयति रवींदु स्तनयुगाम् ॥19॥

बिन्दु वदन
युगल पयोधर
बिन्दिकायें अधः संस्थित
पुनः उसके अधःस्थित
जो सुभग त्रिभुज त्रिकोणमय है
कामबीजमयी तुम्हारी कर्षिणी मन्मथ कला वह
ध्यान में जिसके तुम्हारी
कामकला है विराजित
वह विक्षुब्ध कर देता सपदि
विविध वनिता वृन्द को
किन्तु इसकी कौन गणना, बात तो यह तुच्छ सी है
सूर्य-चन्द्र उरोजमयि
यह जो त्रिलोकी है विराजित
कर दिया करता उसे विचलित तुम्हारा ध्यानधारी
हे मदनमादिनि!
मनोभव स्मरकला हे! ॥१९॥
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किरंतीमंगेभ्यः किरणनिकुरुंबामृतरसं
हृदित्वामाधत्ते हिमकरशिलामूर्तिमिव यः ।
स सर्पाणां दर्पं शमयति सकुंताधिप इव
ज्वरप्लुष्टान दृष्ट्या सुखयति सुधाऽऽधारसिरया ॥20॥
 
चन्द्रकान्त सुमणि शिला सम
द्युतिमयी कमनीय काया
अंग अंग बिखेरती
पीयूष रसमयि किरणमाला
यह सुभग लावण्यमय तन
ध्यान में जिसने उकेरा निज हृदस्थल बीच
वह खगपति सदृश
करता शमन है सर्प दर्प विशाल
और जो आक्रान्त हैं ज्वर से उन्हें
निज पीयुषवर्षी नयन कोरक से निहार उबारता
सुख पात्र कर देता
सुधारस वर्षिणी हे! ॥२०॥
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तडिल्लेखातन्वीं तपनशशिवैश्वानरमयीं
निषण्णां षण्णामप्युपरि कमलानां तव कलाम् ।
महापद्माटव्यां मृदितमलमायेन मनसा
महान्तः पश्यन्तो दधति परमाह्लादलहरीम् ॥21॥

तुम तड़ितलेखा-सम
ज्योतिर्मयी
सूक्ष्मातितन्वी
ज्योति भी कैसी
कि ज्यों द्युतिमान हों रवि शशि हुताशन
कायस्थित
षट् चक्र कमलों पर
सहसदल पद्म ऊपर
नित्य मायिकमल रहित मन
देवि ! परमाह्लादलहरी
दीप्त तेरी इस कला का
हृदय में साक्षात करते
डूबते हैं
समुद योगी वृन्द ॥२१॥
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भवानि त्वं दासे मयि वितर दृष्टिं सकरुणा-
मिति स्तोतुं वांछन्कथयति भवानि त्वमिति यः ।
तदैव त्वं तस्मै दिशसि निजसायुज्यपदवीं
मुकुन्द-ब्रह्मेन्द्र-स्फुट-मुकुट-नीराजित-पदाम् ॥22॥

’फेर दो मुझ पर कृपा करुणार्द्र लोचन
हे भवानी!’
जो स्तुति अभिलषित
यह कहता वचन है
उसे निज सायुज्य पदवी
तुम सहर्ष प्रदान करती
सौंपती हो
वह चरण पाथोज
जिसका
विष्णु-ब्रह्मा-देवपति के भाल पर सुन्दर विराजित
मुकुट उतारता है आरती अभिराम नित ॥२२॥

निज सायुज्य पदवी - मुक्ति चार तरह की होती है : १.सारूप्य (वही रूप प्राप्त कर लेना, जैसे जटायु की मुक्ति -गिद्ध देंह तजि धरि हरि रूपा), २.सामीप्य (समीप रहना), ३.सालोक्य(वह लोक प्राप्त कर लेना) और ४.सायुज्य (वही हो जाना-’तत्वमसि’ वाला भाव)
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त्वया हृत्वा वामं वपुरपरितृप्तेन मनसा
शरीरार्द्धं शम्भोरपरमपि शंके हृतमभूत् ।
यदेतत्त्वद्रूपं सकलमरुणाभं त्रिनयनं
कुचाभ्यामानभ्रं कुटिलशशिचूडालमुकुटं ॥23॥

शंभु के वामांग का
कर ही लिया तुमने हरण है
पुनः अभीं अतृप्त मन से शेष को भी चाहती हो
क्योंकि तेरे रूप की यह अरुणिमा
प्रत्यक्ष होती प्रकट
शंकर में
विलोचन तीन
आधा चन्द्रमा चूड़ा मुकुट में
नम्र युग कुच भार से
यह अरुणिमा संवलित तेरा रूप
हर अर्द्धांगिनी हे! ॥२३॥




क्रमशः-----

August 28, 2011

बन्धन तोड़ प्राण तुम आये (गीतांजलि का भावानुवाद)

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Tagore (Source:google)
In the deep shadows of the rainy July,
with secret steps, thou walkest,
silent as night, eluding all watchers.

Today the morning has closed its eyes,
heedless of the insistent calls of
the loud east wind, and a thick veil
has been drawn over the ever-wakeful blue sky.

The woodlands have hushed their songs,
and doors are all shut at every house.
Thou art the solitary way-farer in
these deserted street. Oh my
only friend, my best beloved,
the gates are open in my house-
do not pass by like a dream.   (Geetanjali : Tagore)


घन बोझिल पावसी जुलाई के छाया कर नीरद छाये
निशिवत मौन दबे पद चुपके बन्धन तोड़ प्राण तुम आये .

सनन् सनन् बहती पुरवइया किया प्रात ने मुद्रित लोचन
सतत जागृत नील गगन पर घिरा सघन नीरद अवगुण्ठन
कोलाहल करते पुकारमय पूर्व प्रभंजन के स्वर छाये
निशिवत मौन दबे पद चुपके बन्धन तोड़ प्राण तुम आये .

गूँजा गीत विपिन अवनी का मुद्रित सब पट सकल निलय के
शून्य गली में इस एकाकी तुम्हीं भ्रमणकर्त्ता परिचय के
परम सुहृद हे प्रियतम तुम ही भ्रमण कर रहे दायें बायें
निशिवत मौन दबे पद चुपके बन्धन तोड़ प्राण तुम आये.

 हे सुनसान पंथ के सहचर प्रिय क्या तुमने दिया भुला है
सबके निलय कपाट बन्द पर प्रियतम मेरा द्वार खुला है
'पंकिल' जीवन धन सपना सम निकल न जाना चरण बढ़ाये
निशिवत मौन दबे पद चुपके बन्धन तोड़ प्राण तुम आये.    ('पंकिल' - मेरे बाबूजी)

August 20, 2011

’शील’ और ’अनुशासन’

फेसबुक सबके लिए बहुत अनुकूल है, पर मुझे सुहाता नहीं ! इतनी रफ्तार का आदी मैं नहीं ! चीजें बहुत तेज गुम होती जाती हैं वहाँ । कितने लिंक, कितने थ्रेड सहेजूँ ? खैर, वहाँ एक प्रश्न दिखा, उत्तर वहाँ दे सकूँ, यह कौशल नहीं मेरे पास । जो कहने का मिजाज बना, उसे वहाँ कहना असुविधापूर्ण था, सो उत्तर प्रश्नकर्त्ता को मेल कर दिया मैंने । उन्होंने प्रवृत्त किया तो बात कहने ब्लॉग पर आया हूँ! यहाँ, वहाँ की बातें लिखूँगा, सो बहुत तात्विक और पारिभाषिक यहाँ कुछ भी न मिलेगा ! मेरा चिन्तन भी भाव के साथ खूब रहस-वन विचरता है । सो उस अठखेली का अबूझ रस तो मिलेगा ही !

अब ’शील’ पर आयें ! ’शील’ और ’अनुशासन’ में अन्तर है जरूर। शील को पूरी तरह न तो ज्ञान से ही जोड़ कर देख सकेंगे और न ही केवल शारीरिक क्रिया या व्यवहार से । हाँ, अनुशासन जरूर एक व्यवस्था है, जो हमें हमारी क्रियाओं और व्यवहार (ज्ञानात्मक, क्रियात्मक) के संबंध में निर्देशित करता रहता है । ख़बर रखें, यदि किसी सभा या सार्वजनिक स्थान पर वाणी (भाषा से अभिव्यक्त) चिन्तन की वस्तुनिष्ठा या सार्वजनिक सभा का हिस्सा होने के प्रति कृत संकल्पित रहती है, तब तक वह शील का एक आवरण मात्र है । हम सजग होकर अभिव्यक्त हैं, बह नहीं रहे हैं-चेहरों से चेहरा मिलाकर भाषायी व्यवहार कर रहे हैं - तब तक वह भाषा शीलावरण बन सकती है-दार्शनिकों की भाषा-सी (लगे हाँथ बुद्ध और राम के अन्तर को भी समझते जाइयेगा) । पर ज्यों ही भाषा भावों की सहचरी बनी, भावों की भी भाषा बनी- तब वही "वाणी शील की सरस्वती बन जाती है" । शील व्यक्ति के जीवन का दर्शन (मात्र) नहीं, काव्य है । कुछ सोच-समझ कर, अपने लिए कोई व्यवस्था बना कर, अपने जीवन या व्यवहार के लिए कोई अचल प्रतिष्ठा कर (मतलब अनुशासन-सा) व्यक्ति का शील निर्मित नहीं होता । इस शील का निर्माण हृदय की व्यवस्था से होता है, और यह व्यवस्था प्रतिक्षण चञ्चल गति से निर्मित होती है । 

यह था प्रश्न
-शील और अनुशासन में क्या अंतर है ?
-या दोनों समान हैं?
-बुद्ध का शील और रामायण में वर्णित राम का गुण-शील क्या एक ही हैं?

शील और अनुशासन में... (18) 2011-08-20 11-45-40
शील एक समजात स्वभावसिद्ध गुण है। इसे कहीं से सीखने या समुपार्जित करने की आजीवन आवश्यकता नहीं रहती । शील व्यक्तित्व का वह अविच्छिन्न अंग है जिससे मानवता अलंकृत होती है । जैसे पूरे पुद्गल में रक्त परिभ्रमण करता है, जैसे अस्थिसमूह पर चर्मावेष्टन रहता है, जैसे श्वांस संचरण की संजीवनी अनकहे शरीर को परिप्लुत किए रहती है, वैसे ही शील नस-नस की आभा है ।
शील को विचारकों ने एक उदात्त अवदान स्वीकार किया है, और यह सब्लिमिटी (Sublimity) किसी और नाम से अभिहित नहीं की जा सकती । शील केवल शील है, और वह कोई ओढ़ी हुई चादर नहीं है कि वह उतार कर रख दी जाय, और न जाड़े की आग है कि दूर से बैठ कर उसका आनन्द लिया जाय । शील का अर्थ है सम्पूर्णता, जीवनी शक्ति और मानवता का दैवीय धन । शीलवान वह अरुणोदय है जो पूरे व्योम मण्डल को, पूरे धरामण्डल को और पूरे आभामण्डल को अपने में समेटे रहता है । 

रामचरित मानस में सारे गुणों से ऊपर शील की प्रतिस्थापना हुई है-“विद्या विनय निपुण गुण शीला”। सारे गुण, सारी निपुणता, सम्पूर्ण विद्या, सारा विनय शील की आरती उतारता है । सब का सम्मिलित नाम ही शील है । शील गृहिणी की पाकशाला, मल्ल की व्यायामशाला, शिशु की पाठशाला, युवक की रमणशाला और वृद्ध की संस्मरणशाला में समान रूप से वैसे ही बहता रहता है जैसे धमनियों में खून । भाव यह कि प्रवहमान जीवन, भाव विगलित जीवन-दशा, ’करऊँ प्रणाम जोरि जुग पानी’ जैसी सहजता-सरलता, हरी दूब जैसी विनम्रता, ताल-वृक्ष जैसी अकड़ नहीं, गिरि-शृंग जैसी पकड़ नहीं और उदधि उद्वेलन जैसा वितंडावाद नहीं । 

शील तो शायद किसी परिस्थिति के ’बाद’ अपनी गरिमामयी उपस्थिति देता है, जैसे ’मर्यादापुरुषोत्तम’ राम, कर्त्तव्यनिष्ठ राम जो वैभव का सुख-भोग कर वनवास करते हैं, लक्ष्मण के शक्ति से मूर्छित होने पर कहते हैं -"जो जनितेऊँ बन बंधु बिछोहू, पिताबचन मनितेऊँ नहिं ओहू।" अंदाजा लगाइये कि इस असह्य क्षण में भी यदि राम यह कहते कि ’भले ही लक्ष्मण को हमें खोना पड़े, पर हमें तो हमारा कर्त्तव्य प्रिय है’-तो कैसा लगता ! तो पूर्व के राम और बाद के राम में कोई अन्तर न दीखता तब । तब राम की देश में जड़स्थिति बनी रहती, पर काल ने जिस परिवर्तन की सृष्टि की उससे राम विमुक्त-से लगते ।

रही अनुशासन की बात तो वह आयास अर्जित है । अनुशासन को अपने में लागू करना होता है । अनुशासन से क्या ऐसा लगता नहीं कि समाज की तो सध रही है, व्यक्ति टूट जाता है । अनुशासन ’इंजेक्शन’ (injection) से लिया दिया गया ’vigour’(जीवन-रस) है । स्वतः तरंगित शोणित उर्जा नहीं है । अनुशासन को स्खलित होते, पतित होते देखा गया है, देखा जा रहा है । विश्वामित्रों की निर्विकल्प समाधियाँ गिरीं, अनुशासन टूटा । स्वतंत्रता की क्रांति से लेकर वर्तमान की एक आँधी जैसी क्रान्ति (अन्ना-आँधी) में शासक-प्रशासक के अनुशासन बने-गिरे, ’यह’-’वह’ की अनुशासनात्मक पतंग उड़ायी गयी । इसलिए अनुशासन की कई मुख मुद्रायें देखी गयीं और ऐसा हो क्यों नहीं ? अनुशासन शासन का अनुगामी है । वह उसके पीछे-पीछे चलता है । अनुशासन में चेहरे-चेहरे की खिंची-खिंची रेखाएं हैं, शील का दीप्तमान भाल कहाँ है ? अनुशासन प्रबल हो सकता, सजल नहीं हो सकता । शील जहाँ जनमानस का प्रफुल्ल शतदल है ,अनुशासन वहीं वाटिका की चहारदीवारी के किनारे लगी हुई बबूल की डाल है । अनुशासन अवरोधक हो सकता है, अभिसिंचक नहीं । अनुशासन सुरक्षा है, संस्कार नहीं । अनुशासन अभिजात है, सहजात नहीं । अनुशासन दोपहरी है जरूर, लेकिन जीवनाकाश की ऊषा बेला या सूर्यास्त की गोधूलि बेला नहीं है । 

रामचरितमानस में आया है कि अनुशासन को मानना या जानना होता है – “को नहिं मान निगम अनुशासन” । राम ने कहा, वही मुझे प्रिय है-“मम अनुशासन मानेइ जोई।” साफ है कि अनुशासन मान ले, मना ले की तरकीब है । अनुशासन सीखना पड़ता है, सिखाना पड़ता अहि । अनुशासन की ’एन०सी०सी०’ होती है, ’स्काउट’ होता है, सेना होती है, संसद होती है, ट्रेनिंग स्कूल’ होते हैं । कहीं शील की भी कोई ’जिम्नास्टिक गैलरी’ है! अनुशासन के स्थान विशेष, व्यक्ति विशेष, परिस्थिति विशेष में नियम कानून बदलते रहते हैं । पश्चिम वाले अपनी दायीं ओर चलने को अनुशासन कहते हैं, हमारे यहाँ सड़क पर बायें चलने को अनुशासन कहते हैं । ’Keep Silent’ का बोर्ड लगा रहता है, स्वयं पढ़कर चुप रहो या थप्पड़ खाकर चुप रहो-चुप रहना अनुशासन हो गया । आसन लगाकर बैठा हुआ सन्यासी बिना इश्तेहार के चुप है । इसे अनुशासन तो नहीं कहेंगे, यह ध्यानी का शील है, स्मृतियों का अनुशासन नहीं ।

शील-निरूपण को लेकर एक किताब पढ़ी थी- ’शील निरूपण : सिद्दान्त और विनियोग’ । लेखक थे ’श्री जगदीश पाण्डेय’ । इस किताब को झटके में ही पढ़ा था का०हि०वि०वि० के पुस्तकालय में बैठे-बैठे । कुछ पन्ने जो लिख मारे थे, उन्हीं से ’शील’ की परत खुलेगी-ऐसा मुझे लगता है । लीजिए -
  • यों तो मनुष्य मात्र का सामान्य सत्तासार ज्ञातृत्व, कर्तृत्व और भोक्तृत्व शक्तियों की एक सम्पृक्त अन्विति है, पर व्यक्ति के शील-भवन की आधार-शिला उसकी भोक्तृत्व-पद्धति ही है ।
  • यदि ज्ञान से मनुष्य के शील का सीधा या उलट लगाव नहीं तो कोरी शारीरिक क्रिया का भी शील से कोई अटूट या अन्योन्याश्रित संबंध नहीं । जहाँ हाव के पीछे भाव नहीं, वहां शील नहीं । क्रिया मात्र शील नहीं, जब तक वह प्रतिक्रिया न हो ।
  • शील को पुतली उलटकर देखने की, अवचेतन के छाया-संस्कारों और प्रेत-स्मृतियों को जीवित व्यक्तित्व की विरल-विशेषता मान लेने की, जो परिपाटी चल पड़ी है, वह निंद्य है । जब तक ये संस्कार निष्प्राण, बलहीन उच्छ्वास मात्र रहते हैं तब तक इनकी संश्लिष्ट अभिव्यक्ति नहीं होती ।
  • शील स्वसहाय होता है, नितान्त असहाय नहीं । ऐसा स्पष्ट दीखना चाहिए कि शीलवान भोक्ता है, अतएव कर्ता है, कुछ करण नहीं ।
  • विरोध करने और विरोध का सामना करने का सामर्थ्य नहीं तो शील नहीं । जल के वेगवान प्रवाह में बहते हुए बोतल के काक में शील नहीं, विवशता है । पहाड़ पर ठोकर लगे और घर का सिल फोड़नेवाले बुद्धिमान में मूर्खता के साथ शील की निराली अदा भी है ।
  • शीलवान की सत्ता देश में स्थित ही नहीं, काल की परिवर्तनशीलता की सहधर्मिणी होनी चाहिए । शील की अभिव्यक्ति जीवन की एक घटना है, व्याकरण की संज्ञा नहीं; आत्मदान है, गुण या प्रवृत्ति की भाववाचक सत्ता नहीं । इसी तरह शील का स्खलन परिस्थिति सापेक्ष रसोद्रेक है, स्थिर या स्थायी ताप-तुषार नहीं ।
और-और लिखा जा सकता है इस किताब से । बस बहाने मिलते रहें, मैं नियमित रह सकूँ !
और अगली प्रविष्टियों में……..
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हाँ, चलते-चलते एक जिज्ञासा ने घेर लिया है । ’शील’ को अंग्रेजी में क्या कहेंगे ?  अर्थ प्रतीक्षित ।

August 7, 2011

सौन्दर्य लहरी-5


’सौन्दर्य-लहरी’ संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है । आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य । निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है ’सौन्दर्य-लहरी’ में । उत्कंठावश इसे पढ़ना शुरु किया था, सुविधानुसार शब्दों के अर्थ लिखे, मन की प्रतीति के लिये सस्वर पढ़ा, और भाव की तुष्टि के लिये हिन्दी में इसे अपने ढंग से गढ़ा । अब यह आपके सामने प्रस्तुत है । ’तर्तुं उडुपे नापि सागरम्’ - सा प्रयास है यह । अपनी थाती को संजो रहे बालक का लड़कपन भी दिखेगा इसमें । सो इसमें न कविताई ढूँढ़ें, न विद्वता । मुझे उचकाये जाँय, उस तरफ की गली में बहुत कुछ अपना अपरिचित यूँ ही छूट गया है । उमग कर चला हूँ, जिससे परिचित होउँगा, उँगली पकड़ आपके पास ले आऊँगा । जो सहेजूँगा, यहाँ लाकर रख दूँगा । साभार। पहली , दूसरी , तीसरी, चौथी कड़ी के बाद आज पाँचवीं कड़ी --
सौन्दर्य लहरी के यह रूपान्तरित छन्द पहले मुक्त छन्द में लिखने शुरु किए थे । बाद में अमरेन्द्र के उचकाने पर छ्न्दबद्ध लिखने का प्रयास दूसरी प्रविष्टि में दिखा आपको । टिप्पणियाँ, मेल इनबॉक्स-दोनों ने छन्दबद्ध रूप से ज्यादा छन्दमुक्त रूप को सराहा । प्रयास तो यही था कि नियमित तीन चार छन्दों की प्रस्तुति से इस ग्रंथ को सम्पूर्णतः प्रस्तुत कर दूँगा, पर अनगिन व्यतिरेकों ने राह रोकी, मैं ठहरा ही रह गया । एकांत के क्षण जब खूब सघन होकर चेतना पर छा गए तो पुनः इस लहरी का सौन्दर्य स्मरण में आया । मैं सायास उपस्थित हूँ इन छन्दों को प्रस्तुत करने के लिए । ढंग वही मुक्त छंदी, आपको रुचिकर लगेगा, इसलिए ।
कवीन्द्राणां चेतःकमलवनबालातपरुचिं
भजन्ते ये सन्तः कतिचिदरुणामेव भवतीम्
विरिंचिप्रेयस्यास्तरुणतरश्रृंगारलहरी-
गभीराभिर्वाग्भिर्विदधति सतां रंजनममी ॥16॥

कमल कानन सदृश
कविवर चित्त किसलय पुट विकासिनि
तुम नवल रवि सदृश
कोई हर्षदा अरुणिम विभा हों
बाल दिनमणि सम तुम्हारी कान्ति का
जो स्मरण करते, धन्य वे मतिमान
उनकी विधिप्रिया रसरंजिनि
अति सुरुचि मधु शृंगार लहरी
स्फुटित हो जाती विमल 
वागीश्वरी रंजनमयी नित
सुकवि मानस मोदिनी
वाणी विधात्री 
अहह अरुणा ! ||16||
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सवित्रीभिर्वाचां शशिमणिशिलाभंगरुचिभिः
वशिन्याद्याभिस्त्वां सह जननि संचिन्तयति यः
स कर्ता काव्यानां भवति महतां भंगिरुचिभिः 
वचोभिः वाग्देवी वदन कमलामोद मधुरैः ॥17॥

चन्द्रकान्त सुमणि शिलाकण चूर्ण
शोभित शुभ्र तन द्युति
वशिन्यादि समेत 
मातः !
महाकाव्यकृती
जननि हे !
ध्यान जो करता तुम्हारा
वह सरस्वति वदन कमला मोदिता
मधु वैखरी से
पूरिता स्रोतस्विनी शुचि
परम सुन्दर सूक्ति संयुत
काव्य रचना में निपुणता प्राप्त कर लेता महत्तम ||17||

{वशिन्यादि समेत - सर्व रोग हर अष्टार चक्र की आठ वाग्देवता-वशिनी, कामेश्वरी, मोदिनी, विमला, अरुणा, जयती, सर्वेश्वरी, कौलिनी । --इनके मंत्र स्वरूप 'अ' 'क' 'च' 'ट' 'त' 'प' 'य' 'श' वर्ण वाली सम्पूर्ण मात्रिका शक्तियाँ ।}
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तनुच्छायाभिस्ते तरुणतरणिश्रीसरणिभिः-
र्दिवं सर्वामुर्वीमरुणिमनिमग्नां स्मरति यः
भवंत्यस्य त्रस्यद्वनहरिणशालीननयनाः
सहोर्वश्या वश्याः कति कति न गीर्वाणगणिकाः ॥18॥

यौवनोल्लसितोर्मि
दिनकर किरण सम
श्री सरणि युक्ता
लालिमाप्लुत
जो तुम्हारी काय छवि छाया छिटकती
कर रहा है स्नान जिसमें स्वर्ग
और जिसमें भू निमग्न है
उस तुम्हारी तन अरुणिमा का
स्मरण करता अमल जो
चकित हरिणीप्रेक्षणा
अनगिनत ऐसी अप्सरायें
कौन हैं जो उर्वशी के संग
उसकी वशीभूता हो नहीं जातीं
तुम्हारे ध्यान धन से धन्य है जो
छविमयी श्रीमंतिनी हे !
देवि अरुणा भगवती हे !  ||18|| 

क्रमशः----

May 23, 2011

सौन्दर्य लहरी-4

’सौन्दर्य-लहरी’ संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है । आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य । निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है ’सौन्दर्य-लहरी’ में । उत्कंठावश इसे पढ़ना शुरु किया था, सुविधानुसार शब्दों के अर्थ लिखे, मन की प्रतीति के लिये सस्वर पढ़ा, और भाव की तुष्टि के लिये हिन्दी में इसे अपने ढंग से गढ़ा । अब यह आपके सामने प्रस्तुत है । ’तर्तुं उडुपे नापि सागरम्’ - सा प्रयास है यह । अपनी थाती को संजो रहे बालक का लड़कपन भी दिखेगा इसमें । सो इसमें न कविताई ढूँढ़ें, न विद्वता । मुझे उचकाये जाँय, उस तरफ की गली में बहुत कुछ अपना अपरिचित यूँ ही छूट गया है । उमग कर चला हूँ, जिससे परिचित होउँगा, उँगली पकड़ आपके पास ले आऊँगा । जो सहेजूँगा, यहाँ लाकर रख दूँगा । साभार। पहली , दूसरी, तीसरी के बाद आज चौथी कड़ी --
सौन्दर्य लहरी के यह रूपान्तरित छन्द पहले मुक्त छन्द में लिखने शुरु किए थे । बाद में अमरेन्द्र के उचकाने पर छ्न्दबद्ध लिखने का प्रयास दूसरी प्रविष्टि में दिखा आपको । टिप्पणियाँ, मेल इनबॉक्स-दोनों ने छन्दबद्ध रूप से ज्यादा छन्दमुक्त रूप को सराहा । प्रयास तो यही था कि नियमित तीन चार छन्दों की प्रस्तुति से इस ग्रंथ को सम्पूर्णतः प्रस्तुत कर दूँगा, पर अनगिन व्यतिरेकों ने राह रोकी, मैं ठहरा ही रह गया । पुनः पुनः सोचता हूँ, पुनः पुनः ठहर जाता हूँ ।  पुनः इस लहरी का सौन्दर्य स्मरण में आया सो मैं सायास उपस्थित हूँ इन छन्दों को प्रस्तुत करने के लिए । ढंग वही मुक्त छंदी, आपको रुचिकर लगेगा, इसलिए ।

त्वदीयं सौंदर्यं तुहिनगिरि कन्ये तुलयितुं ।
कवींद्राः कल्पंते कथमपि विरिंचि प्रभृतयः ॥
यदालोकौत्सुक्यादमरललना यांति मनसा ।
तपोभिर्दुष्प्रापामपि गिरिशसायुज्यपदवीम् ॥१२॥

तुलित करने को तुम्हारा
अपरिमित सौन्दर्य अनुपम
विधातादि कवीन्द्र
किंचित कल्पनाओं में विचरते
समुद अवलोकन तुम्हारा
कर मनोगत वसुमती से
अमर ललनायें विलसतीं
सहज शिवसायुज्य पद पा
जो अगम है
जो परम दुष्प्राप्य भी
अति कठिन तप से
दर्शनोत्सुक सुरवधूटी के
परम सौभाग्य की यह
है चरम संसिद्धि
सद्यः संस्फुटित
हिमशैलजा हे! ॥12||
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नरं वर्षीयांसं नयनविरसं नर्मसु जडं ।
तवापांगालोके पतितमनुधावंति शतशः ॥
गलद्वेणीबंधाः कुचकलशविस्रस्तसिचया ।
हठात्त्रुट्यत्कांच्यो विगलितदुकूला युवतयः॥१३॥

जो जरठ वयशील
लोचन सुखदरस वंचित
महाजड़
वहाँ कायाकल्प करता
ललित कृपाकटाक्ष तेरा
स्खलित वेणीवंध
हटती कंचुकी कुचकुंभ द्वय से
भग्न होती किंकिणी
पट स्कंध से जाता सरक है
यों ललक
विगलित दुकूला
रमणियाँ, नवयौवनायें
दौड़ती उत्कंठिता उसकी दिशा में
कर्षिता-सी
यह तुम्हारी दृष्टि का फल है
कृपा करुणाकटाक्षे! ॥13॥
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क्षितौ षट्पंचाशद्द्विसमधिकपंचाशदुदके ।
हुताशे द्वाषष्टिश्चतुरधिकपंचाशदनिले ॥
दिवि द्विःषट्त्रिंशन्मनसि च चतुःषष्टिरिति ये ।
मयूखास्तेषामप्युपरि तव पादांबुजयुगम् ॥१४॥

वसुमती में छिटकती हैं
जो कि छप्पन कान्त किरणें
सलिल में बावन
अमलद्युति वह्नि में
बासठ विराजित
वायु में चौवन
बहत्तर व्योम में
मन बीच चौसठ राजती हैं
तत्व तरलित
जो कि ज्योतिर्मयी किरणें
ऊर्ध्व उनके हैं विराजित
ललित मृदु पद-कंज तेरे
(भाव यह
तुम तत्वमयि हो, तुम्हीं तत्वातीत )
सुभगे! ॥14॥
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शरज्ज्योत्स्नाशुभ्रां शशियुतजटाजूटमकुटां ।
वरत्रासत्राणस्फटिकघुटिकापुस्तककराम् ।
सकृन्न त्वा नत्वा कथमिव सतां सन्निदधते ।
मधुक्षीरद्राक्षामधुरिमधुरीणा भणितयः ॥१५॥

शरद की चाँदनी-सी
ज्योतिर्मयी तन शुभ्र आभा
खचित चन्द्र ललाम सिर पर
जटाजूट रचित मुकुट में
वराभय मुद्रा
स्फटिक मणिमाल

शोभित करतली में
पाणि पुस्तक युक्त
इस छवि का न यदि करते नमन तो
सुजन आनन से स्फुरित
किस विधि मधुर
मधु क्षीर द्राक्षा सदृश
बहती मंजुवाणी
देवि !
रुचिर स्वरुपिणी हे ! ॥15॥

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