| कुछ चरित्र हैं जो बार-बार दस्तक देते हैं, हर वक्त सजग खड़े होते हैं मानवता की चेतना का संस्कार करने । पुराने पन्नों में अनेकों बार अनेकों तरह से उद्धृत होकर भी पुनः-पुनः नवीन ढंग से लिखे जाने को प्रेरित करते हैं । इन की अमित आभा धरती को आलोकित करती है, और ज्ञान का प्रदीप उसी से सम्पन्न होकर युगों-युगों तक मानवता का कल्याण करता रहता है । अगली कुछ प्रविष्टियाँ ऐसे ही महानतम चरित्रों का पुनः-स्मरण हैं । नाट्य शैली में लिखी गयीं, क्योंकि ध्येय मंचन था ।....... |
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करुणावतार बुद्ध-1
करुणावतार बुद्ध-2 से आगे.....
सारथी : भूपाल ! नगरी तो ऐसी सजी-सँवरी थी, जैसे अमरावती ही वहाँ उतर आयी हो । सुन्दरियाँ नृत्य-गीत में रत थीं । चंदन की सुगंध से गलियाँ महक रहीं थी । फूलों की वृष्टि हो रही थी । कौन-सा सुख नहीं बरस रहा था ! कुमार भिखारी को देख कर पूछने लगे -
"क्या यह अकेला इस धरती पर घूमने वाला प्राणी है ?"
मैंने कहा - "वृद्ध सबको होना है । नियति का यह खेल है । श्रीमंत भी तत्काल श्रीहीन हो जाते हैं ।"
उनके यह पूछने पर कि क्या मैं, मेरी यशोधरा भी जरा-जीर्ण हो सकती हैं, मैंने हूँ-हूँ कहते हुए बात टालनी चाही, पर वह नहीं माने तो हाँ-हाँ कहना पड़ा । क्या बताऊँ कि वे कितने व्यथित हो गये ? बोले -"क्या अर्थ है ऐसे जीवन का ?"
महाराज ! रथ अभी कुछ ही दूर चला था कि एक कोने में पड़ा हुआ एक गलित कुष्ठ रोगी बिलख रहा था । उसकी गतिविधि की टोह में डूबे सिद्धार्थ स्वयं को गलित कुष्ठ रोगी मान बैठे । "मैं, मेरी यशोधरा भी यह दिन देखेंगे ?"-यह पूछते-पूछते उनका गला सूखा जा रहा था । मैंने समझाने का प्रयास किया -" रोगव्याधि शरीर का धर्म है , आप चिन्ता न करें", किन्तु विश्वव्याधि से वे इतने व्यथित हो गये कि रथ में ही निढाल होकर लेट गये । समझा बुझा कर रथ तीव्र-गति से लौटाने को ही था कि महाराज ! एक और घटना घट गयी ।
राजा : क्या? क्या ? क्या घटना घटी सारथी ?
सारथी : हे प्रजावत्सल ! रथ के वेग में अनजाने ही एक बोझिल गतिमयता समा गयी थी । मुझे लग रहा था दुनिया मानो छाया-छाया, टुकड़े-टुकड़े में बँटी किसी दर्पण में प्रतिबिम्बित माया हो । लग रहा था मार्ग में कोई कापालिक अशुभ मंत्र पढ़ रहा हो । आत्मा तड़प-तड़प कर जैसे निचुड़े शरीर से आगे बढ़ने को आतुर थी । एक मर्मांतक चीख वायु को बींध रही थी । आकाश से एक स्वर लहरी सुनायी पड़ रही थी जैसे, जिसे सब सुन रहे थे - वनस्पतियाँ, पखेरू और राजकुमार भी । आपके पुत्र के तो जैसे सौ-सौ कान हो गये हों । वह पागल-से हो गये थे । इधर-उधर फटी-फटी नजरें दौड़ाते, लम्बी गर्म श्वांसे छोड़ रहे थे । अचानक ही चार कंधों पर रखा हुआ एक शव श्मशान भूमि की ओर जा रहा था । एक पिता अपने नवयुवक पुत्र के विदा हो जाने पर छाती पीट-पीट कर रो रहा था । ’राम-नाम सत्य है’ की कर्णभेदी आवाज कलेजा विदीर्ण कर रही थी ।
सिद्धार्थ ने पूछा- "यह क्या ?"
मैंने जीवन के ध्रुव सत्य मरण की ओर संकेत किया । उन्होंने बलिष्ठ निर्जीव काया को क्षण भर में मुट्ठीभर राख में बदलते देखा । उनके प्राण हाहाकार कर उठे । पूछा -"इस अवस्था में कौन जाते हैं ?" मैंने कहा -
" सब । आप , हम, देवि यशोधरा, नृप, रानी -सब के सब जन्मे हुए प्राणी कालचक्र के कलेवा बन कर रहते हैं । इस कालचक्र को कोई टाल नहीं सकता ।"हे अन्न दाता ! राजकुमार ने कहा -
" सारथी ! लौट चलो ! जान गया जीवन में मनुष्य को सुखों से कहाँ मिलना ? दुख ही मिलते हैं । अब नहीं रुकूँगा । विश्व-वेदना को निर्मूल करके ही मानूँगा । मेरी आँखों की कोर में जब आँसू खड़ा रहेगा, तभी जिन्दगी दिल खोल कर बातें करेगी । उठो, चलो सिद्धार्थ ! दुख तुम्हारी खोज में तुम्हारे द्वार पर आया है । देशान्तर, कालान्तर, देहान्तर, रूपान्तर की अक्षर यात्रा की अब बेला आ पहुँची है । सारथी, रथ फेरो ! देखो, सूर्यमंडल से सूर्यग्रहण ज्यादा अद्भुत है ।"इस तरह वे न जाने कहाँ खो गये । रथ आया, रथ के साथ उनका शरीर भी लौटा , किन्तु मन कहीं छूट गया । मैंने प्रकृतस्थ करने का प्रयास किया, पर वो बोलते रहे, बड़बड़ाते रहे -
" अकेलापन है राह । क्षयनाश, व्यवधान, परिवर्तन, मृत्यु, कुटिलता, माया - अब तुमसे अंतिम विदा । सारथी मेरे ! सुख का क्या पीछा करना ? मुझसे पूछना मत, दुख का रंग कैसा है ? न जाने कितने मन्वंतरों से सो रहे हैं मेरी हड्ड़ियों में सारे क्षोभ, सारे विषाद । "ऐसा ही न जाने क्या-क्या उच्चरित करते रहे । फिर सो गये । महाराज ! उन पर विशेष निगरानी रखी जाय !
राजा : (दीर्घ श्वांस लेते हुए ) महारानी ! कुछ अघटित घटने के संकेत मिल रहे हैं । विचित्र स्वप्न कई दिनों से देख रहा हूँ । देखिये, आगे विधाता क्या-क्या दिखाता है ?
रानी : प्राणनाथ ! मेरा पुत्र मुझे बार-बार न जाने क्यों ज्योतिर्मय कमल-सा दिखता है । मैं तो यह सुनकर डर गयी थी, जब वह एक रात मेरी गोद में लेटा हुआ बड़बड़ा रहा था -
"अपने प्राणों पर मैंने यह देह जीवनधर्म समझकर धारण की है । मेरी व्यक्तिसत्ता विश्वसत्ता है । "राजन ! पुत्र को सांसारिकता के मधुकोषपीठ में उलझाये रखना जरूरी हो गया है । हम हारने के पहले ही सचेत हों, यही अच्छा है ।
राजा : हाँ रानी ! कल किसी युक्ति से सिद्धार्थ को संसार-राग में डुबाने का पूरा प्रयास करुँगा ।
अगली प्रविष्टि में जारी .....















