November 20, 2009

करुणावतार बुद्ध -3

कुछ चरित्र हैं जो बार-बार दस्तक देते हैं, हर वक्त सजग खड़े होते हैं मानवता की चेतना का संस्कार करने । पुराने पन्नों में अनेकों बार अनेकों तरह से उद्धृत होकर भी पुनः-पुनः नवीन ढंग से लिखे जाने को प्रेरित करते हैं । इन की अमित आभा धरती को आलोकित करती है, और ज्ञान का प्रदीप उसी से सम्पन्न होकर युगों-युगों तक मानवता का कल्याण करता  रहता है । अगली कुछ प्रविष्टियाँ ऐसे ही महानतम चरित्रों का पुनः-स्मरण हैं । नाट्य शैली में लिखी गयीं, क्योंकि ध्येय मंचन था ।.......

करुणावतार बुद्ध-1
करुणावतार बुद्ध-2 से आगे.....


सारथी :  भूपाल ! नगरी तो ऐसी सजी-सँवरी थी, जैसे अमरावती ही वहाँ उतर आयी हो । सुन्दरियाँ नृत्य-गीत में रत थीं । चंदन की सुगंध से गलियाँ महक रहीं थी । फूलों की वृष्टि हो रही थी । कौन-सा सुख नहीं बरस रहा था ! कुमार भिखारी को देख कर पूछने लगे -
"क्या यह अकेला इस धरती पर घूमने वाला प्राणी है ?"
मैंने कहा - "वृद्ध सबको होना है । नियति का यह खेल है । श्रीमंत भी तत्काल श्रीहीन हो जाते हैं ।"
उनके यह पूछने पर कि क्या मैं, मेरी यशोधरा भी जरा-जीर्ण हो सकती हैं, मैंने हूँ-हूँ कहते हुए बात टालनी चाही, पर वह नहीं माने तो हाँ-हाँ कहना पड़ा । क्या बताऊँ कि वे कितने व्यथित हो गये ? बोले -"क्या अर्थ है ऐसे जीवन का ?"

महाराज ! रथ अभी कुछ ही दूर चला था कि एक कोने में पड़ा हुआ एक गलित कुष्ठ रोगी बिलख रहा था । उसकी गतिविधि की टोह में डूबे सिद्धार्थ स्वयं को गलित कुष्ठ रोगी मान बैठे । "मैं, मेरी यशोधरा भी यह दिन देखेंगे ?"-यह पूछते-पूछते उनका गला सूखा जा रहा था । मैंने समझाने का प्रयास किया -" रोगव्याधि शरीर का धर्म है , आप चिन्ता न करें", किन्तु विश्वव्याधि से वे इतने व्यथित हो गये कि रथ में ही निढाल होकर लेट गये । समझा बुझा कर रथ तीव्र-गति से लौटाने को ही था कि महाराज ! एक और घटना घट गयी ।

राजा :  क्या? क्या ? क्या घटना घटी सारथी ?

सारथी :  हे प्रजावत्सल ! रथ के वेग में अनजाने ही एक बोझिल गतिमयता समा गयी थी । मुझे लग रहा था दुनिया मानो छाया-छाया, टुकड़े-टुकड़े में बँटी किसी दर्पण में प्रतिबिम्बित माया हो । लग रहा था मार्ग में कोई कापालिक अशुभ मंत्र पढ़ रहा हो । आत्मा तड़प-तड़प कर जैसे निचुड़े शरीर से आगे बढ़ने को आतुर थी । एक मर्मांतक चीख वायु को बींध रही थी । आकाश से एक स्वर लहरी सुनायी पड़ रही थी जैसे, जिसे सब सुन रहे थे - वनस्पतियाँ, पखेरू और राजकुमार भी । आपके पुत्र के तो जैसे सौ-सौ कान हो गये हों । वह पागल-से हो गये थे । इधर-उधर फटी-फटी नजरें दौड़ाते, लम्बी गर्म श्वांसे छोड़ रहे थे । अचानक ही चार कंधों पर रखा हुआ एक शव श्मशान भूमि की ओर जा रहा था । एक पिता अपने नवयुवक पुत्र के विदा हो जाने पर छाती पीट-पीट कर रो रहा था । ’राम-नाम सत्य है’ की कर्णभेदी आवाज कलेजा विदीर्ण कर रही थी ।
सिद्धार्थ ने पूछा- "यह क्या  ?"
मैंने जीवन के ध्रुव सत्य मरण की ओर संकेत किया । उन्होंने बलिष्ठ निर्जीव काया को क्षण भर में मुट्ठीभर राख में बदलते देखा । उनके प्राण हाहाकार कर उठे । पूछा -"इस अवस्था में कौन जाते हैं ?" मैंने कहा -
" सब । आप , हम, देवि यशोधरा, नृप, रानी -सब के सब जन्मे हुए प्राणी कालचक्र के कलेवा बन कर रहते हैं । इस कालचक्र को कोई टाल नहीं सकता ।"
हे अन्न दाता ! राजकुमार ने कहा -
" सारथी ! लौट चलो ! जान गया जीवन  में मनुष्य को सुखों से कहाँ मिलना ? दुख ही मिलते हैं । अब नहीं रुकूँगा । विश्व-वेदना को निर्मूल करके ही मानूँगा । मेरी आँखों की कोर में जब आँसू खड़ा रहेगा, तभी जिन्दगी दिल खोल कर बातें करेगी । उठो, चलो सिद्धार्थ ! दुख तुम्हारी खोज में तुम्हारे द्वार पर आया है । देशान्तर, कालान्तर, देहान्तर, रूपान्तर की अक्षर यात्रा की अब बेला आ पहुँची है । सारथी, रथ फेरो ! देखो, सूर्यमंडल से सूर्यग्रहण ज्यादा अद्भुत है ।"
इस तरह वे न जाने कहाँ खो गये । रथ आया, रथ के साथ उनका शरीर भी लौटा , किन्तु मन कहीं छूट गया । मैंने प्रकृतस्थ करने का प्रयास किया, पर वो बोलते रहे, बड़बड़ाते रहे -
" अकेलापन है राह । क्षयनाश, व्यवधान, परिवर्तन, मृत्यु, कुटिलता, माया - अब तुमसे अंतिम विदा । सारथी मेरे ! सुख का क्या पीछा करना ? मुझसे पूछना मत, दुख का रंग कैसा है ? न जाने कितने मन्वंतरों से सो रहे हैं मेरी हड्ड़ियों में सारे क्षोभ, सारे विषाद । "
ऐसा ही न जाने क्या-क्या उच्चरित करते रहे । फिर सो गये । महाराज ! उन पर विशेष निगरानी रखी जाय !

राजा :  (दीर्घ श्वांस लेते हुए ) महारानी ! कुछ अघटित घटने के संकेत मिल रहे हैं । विचित्र स्वप्न कई दिनों से देख रहा हूँ । देखिये, आगे विधाता क्या-क्या दिखाता है ?

रानी :  प्राणनाथ ! मेरा पुत्र मुझे बार-बार न जाने क्यों ज्योतिर्मय कमल-सा दिखता है । मैं तो यह सुनकर डर गयी थी, जब वह एक रात मेरी गोद में लेटा हुआ बड़बड़ा रहा था -
"अपने प्राणों पर मैंने यह देह जीवनधर्म समझकर धारण की है । मेरी व्यक्तिसत्ता विश्वसत्ता है । "
राजन ! पुत्र को सांसारिकता के मधुकोषपीठ में उलझाये रखना जरूरी हो गया है । हम हारने के पहले ही सचेत हों, यही अच्छा है ।

राजा :  हाँ रानी ! कल किसी युक्ति से सिद्धार्थ को संसार-राग में डुबाने का पूरा प्रयास करुँगा ।

अगली प्रविष्टि में जारी .....

November 19, 2009

करुणावतार बुद्ध -2

कुछ चरित्र हैं जो बार-बार दस्तक देते हैं, हर वक्त सजग खड़े होते हैं मानवता की चेतना का संस्कार करने । पुराने पन्नों में अनेकों बार अनेकों तरह से उद्धृत होकर भी पुनः-पुनः नवीन ढंग से लिखे जाने को प्रेरित करते हैं । इन की अमित आभा धरती को आलोकित करती है, और ज्ञान का प्रदीप उसी से सम्पन्न होकर युगों-युगों तक मानवता का कल्याण करता  रहता है । अगली कुछ प्रविष्टियाँ ऐसे ही महानतम चरित्रों का पुनः-स्मरण हैं । नाट्य शैली में लिखी गयीं, क्योंकि ध्येय मंचन था ।.......

करूणावतार बुद्ध

(द्वितीय दृश्य )
(सारथी प्रवेश करता है । प्रणाम की मुद्रा में सिर झुकाकर राजा की आज्ञा माँगता है ।)
राजा :  सारथी ! मेरे लाडले की नगर दर्शन की अभिलाषा तृप्त हो गयी ?
सारथी :  हे प्रजावत्सल ! आज तक आपकी सेवा में व्यतीत हुई आयु भर में मैंने कभी ऐसा सारथ्य किया, न कभी ऐसा रथी देखा और न ऐसी विलक्षण अश्वगति देखी । ऐसी होनी भी नहीं देखी महाराज, जैसी इस यात्रा में घटित हुई ।


राजा :  क्या ? कैसा ? बताओ, बताओ !


सारथी :  महाराज, आपके नयनों के तारे ने जैसे ही रथ पर पाँव रखा, वैसे ही मुझे लगा जैसे रथ को किसी ने अमोघ संजीवनी विद्या से अभिमंत्रित कर दिया है । एक अवर्णनीय सुरभि ने रथ को वलयित कर लिया । घोड़े मेरी लगाम के बंधन से मुक्त हो जैसे विचरने लगे । सिद्धार्थ, जो यूँ तो शांत हैं, वाचाल हो गये । कभी स्फुट, कभी अस्फुट शब्दों में कुछ उच्चरित करने लगे जैसे किसी अदृश्य जीवन-संगी के हाथों में हाथ डाल दिया हो । "समय हो गया है, बहुत बेला बीत चुकी’, ’सुन रहा हूँ’, ’बहुत हो चुका, अब नहीं चूकूँगा’, ’क्षमा करना, प्राण ! चलो,चलो’ आदि अनेक असंबद्ध बातें बोलते रहते थे । मुझे आवश्यकतानुसार कभी पूछते, कभी मुस्कराते, फिर रोते, आँसू पोंछते, उदास होते, आँखे बंद कर लेते, धरित्री को नमन करते, यहाँ-वहाँ, रुको-चलो आदि संवेगों में ही उनका समय बीत गया । कहते थे -
"मुझे व्यक्ति से समय बना दिया गया है । अब मुझे अहोरात्र जागना है ।मेरा कोई गोत्र नहीं , कोई नाम नहीं । मैं अजन्मा हूँ । मेरे लिये अब कोई सूर्योदय नहीं, कोई सूर्यास्त नहीं, कोई रंग नहीं, कोई राग नहीं ।...."


राजा :   प्रिय सारथी ! यह मैं क्या सुन रहा हूँ ? अरे, ऐसी कोई घटना तो नहीं घटी कि तुम इतने उद्विग्न-से हो रहे हो ?


सारथी :  हे भाग्यविधाता ! कुछ कहते नहीं बन रहा है वह दृश्य विधान । अभी मैं कुछ ही क्षण चला था चमचमाते नगर के राजमार्ग पर कि औचक घने वृक्षों से भरा जंगल मिल गया । मैं स्तब्ध था कि यहाँ कैसे ? वहाँ की हवा विचित्र थी । न उसमें शीतलता ही थी न जलन । एक काँसे का पात्र काँपती हँथेलियों में सम्हाले दीन-हीन एक भिखारी ठीक सामने खड़ा हो गया । वह रिरिया रहा था -
" तुम्हारे चरणों में आ पड़ा हूँ , निहार लो हे दयालु भगवन !
हमारी बिगरी जनम-जनम की सँवार दो हे दयालु भगवन ! "
उस गरीब की धूसर-धूमिल लटें मलिन कंधों को छू रही थीं । चीथड़े पहने था । रीढ़ की हड्डी धनुषाकार हो गयी थी । धँसी-धँसी-सी आँखों की पलकों में पर्याप्त श्यामलता थी । वाणी कंपित थी । पाँव डगमगा रहे थे । लाठी बड़ी कठिनाई से सम्हाल पा रहा था । पलकों में भूख समाई थी । कंपित वाणी में बोला -
"दया करो दानी । बड़ी दूर से आ रहा हूँ । फटे पैर और इस जीर्ण शरीर से आगे चला नहीं जाता । इस चेहरे पर पड़ी झुर्रियों की सैकड़ों लकीरें  और इनमें भरे पसीने को तुम नहीं देखोगे तो कौन देखेगा ? मैले-मैले, काले-काले हाँथ-पाँव वाले को तुम्हीं ठुकरा दोगे तो फिर दुनिया में और कौन सहारा देने वाला है । एक बार मेरी ओर दया से देख लो बस यही चाहता हूँ । हे दानी ! मेरी एक ही चाह है कि तुम्हारे मधुर कोमल चरणों पर अपनी सारी लघुता समेटे मिट जाऊँ । बोलो, देते हो मुझे मेरी भीख ? "
इतना कहते-कहते वह लुढ़क गया था । सिद्धार्थ कूद पड़े नीचे । बाँहों भर भेंटा उसे । फफक-फफक कर खूब रोये । अंग-रक्षक किसी को रोक नहीं पा रहा था । उनकी गर्म श्वाँसे जैसे कह रहीं थीं - "मैं दुख मिटा कर रहूँगा । यह देखा नहीं जाता । "


(फटी-फटी आँखों से सारथी का मुख निहारते हुए -)
राजा  :  आह ! मेरा पुरुषार्थ यह भी नहीं कर सका कि एक दिन भी उदासीन बेटे को दुनिया के दुख से दूर रख सकूँ । फिर क्या हुआ ? वत्स बोलो !


अगली प्रविष्टियों में जारी........

November 18, 2009

करुणावतार बुद्ध -1


कुछ चरित्र हैं जो बार-बार दस्तक देते हैं, हर वक्त सजग खड़े होते हैं मानवता की चेतना का संस्कार करने । पुराने पन्नों में अनेकों बार अनेकों तरह से उद्धृत होकर भी पुनः-पुनः नवीन ढंग से लिखे जाने को प्रेरित करते हैं । इन की अमित आभा धरती को आलोकित करती है, और ज्ञान का प्रदीप उसी से सम्पन्न होकर युगों-युगों तक मानवता का कल्याण करता  रहता है । अगली कुछ प्रविष्टियाँ ऐसे ही महानतम चरित्रों का पुनः-स्मरण हैं । नाट्य शैली में लिखी गयीं, क्योंकि ध्येय मंचन था ।.......


करुणावतार बुद्ध

(प्रथम दृश्य )
(प्रातःकाल की बेला । महल में राजा और रानी चिन्तित मुद्रा में ।)

शुद्धोधन :  सौभाग्यवती ! कल अरुणोदय की बेला थी । अभी अलसाई आखों से नींद विदा हुई नहीं थी । मैं अपलक निहार रहा था भरी-पूरी देहयष्टि वाले अपने राजदुलारे को । प्रासाद के एक एकांत कोने में वह अनमना बुदबुदाते हुए घूम रहा था । मुखमण्डल बता रहा था, वह सारी रात सोया नहीं है। उसके विद्युम से अरुण अधरों  से कढ़े अप्रासंगिक बोल को मैं सुन रहा था -
"नभ से उतरो कल्याणी किरणों ! हमारा देय शंखजल स्वीकारो । हमारे शेष प्रश्न को अशेष कर दो । लौटो ओ सम्यक दिन । लौटो, हमारी मृत चेतनाओं को धूपाभिषित कर दो ।जी चुका मैं भूत । अशेष करना है हमें यह आज का संघर्ष ताकि अनागत विश्व का यश बन जाये । हम देहजीवी नहीं दृष्टि-जीवी हैं । मेरी उदासी भरी जीवन की उषा को उत्सवगर्भा बना दो ।"
रानी :  हे राजाधिराज ! क्यों कह रहा था सिद्धार्थ यह सब ? यह अबूझ पहेली कैसी ? कौन-सी उदासी ? कौन-सा उत्सव ? कौन-सा शेष प्रश्न ? कैसा सम्यक दिन ? क्या देव शंखजल ?


शुद्धोधन :  सुमुखि ! यही तो अपनी आकुलता है । कुछ समझ में नहीं आ रहा है, उस पुत्र का क्या है उद्वेग ? कलेजे पर हाथ रख कर वह कह रहा था -
"देश का, न काल का-मैं किसी का ताबेदार नहीं । जिन्हें तुम अपना समझते हो, जिन्हें तुम अपनी पहचान बताते हो, जिन्हें तुम प्रतीकों की तरह उठाये-उठाये देश और काल में सदियों से चल रहे हो, क्या तुम इन्हें उठाकर एक किनारे नहीं रख सकते ? चलो, मेरी प्रार्थना ! अब सृष्टि-सुख की भाषा बनकर चलो ! मुझे अपनी शाश्वती के पास लौटना ही होगा, लौटना ही होगा ।"
रानी  :  और, और विरदश्रेष्ठ ! और कुछ भी उच्चरित किया उसके अधरों ने ?
शुद्धोधन  :  हाँ, हाँ भद्रशीले ! बोले जा रहा था -
" आज से मैं विद्रोही हूँ, भयंकर विद्रोही । सुख के विरुद्ध, दुख के विरुद्ध विद्रोह । विद्रोह , अब यही मेरा मान है, यही मेरा अरमान है । हे कोमल पुष्पों ! अब तुम्हारा सौरभ और सौन्दर्य मुझे बंदी नहीं बना सकता । हे पिंजरे के शुक-मैना ! अब तुम्हारे गान मुझे भूल-भुलैयों में नहीं फँसा सकते । हे पवन ! अब त्रिविद प्रवाह की मुझे जरा भी परवाह नहीं । हे अगरु सुगंध ! तेरी मादकता अब मुझे मुग्ध नहीं कर सकेगी । हे सूर्य ! तेरा असह्य ताप मुझे तेरे सामने नतमस्तक नहीं कर सकेगा । अरे स्वार्थवादी मनुष्यों  ! देखना, तुम्हारी स्वार्थांधता और तुम्हारा पाखंड मेरे वज्र हाथों से चूर-चूर हो जायेगा । "
सुन्दरी ! उसके अज्ञात शरीर कम्पन, हृदय के उच्छलन और मन की तड़पन को मैं अदृश्य बैठा हुआ निर्ममता से झेल रहा हूँ ।
(रानी सिसकते हुए राजा से लिपट जाती है ।)
रानी  :  राजन ! विधाता कौन-सा दिन दिखायेगा? मैं अपने लाल को अपने गालों से सटा लूँगी । उसका विषाद बोझिल मुख बार-बार चूमूँगी । उसे दुलराऊंगी, सहलाऊंगी, बहलाऊंगी । माँ की ममता का धागा समेटकर राग की रसरी में उसे बाँधकर , यह पगली माँ उसके प्रस्थान के पथ पर पाषाणशिला-सी बिछ जायेगी ।

(स्वयं अपनी डबडबायी आँखों को पोंछकर संयत होता राजा )
राजा  :  मेरी माया ! क्या-क्या नहीं सुना मैंने ? क्या कह रहा था वह मेरी आँखों की पुतली -
"छोटे-छोटे सुखों की खोज में तूँ भटकता फिरता है । अनन्त आनन्द का स्वप्न मेरा विनोद है । रागासक्ति से तूँ जकड़ा हुआ है । निर्ममता मेरे जीवन की शक्ति है । तेरा काम अनन्त काल तक भटकना है, मेरा लक्ष्य अनन्त में जा मिलना है । खोखले संसार ! तेरा और मेरा क्या संग है ! "
रानी  :  स्वामी ! मैं उसकी पीर की तासीर बचपन से ही तलाशने लगी थी, पर उसे जान पायी नहीं, समझ पायी नहीं । अपनी आत्मा के उस सुन्दर प्रतिबिम्ब में मैं ढूँढ़ती रह गयी उसके निस्रब्ध अंतःकरण में व्याकुलता की वह आग, अधीरता की वह ज्वाला, विरह की वह पीड़ा । जब वह एक अबोध बालक था, तभी से एकान्त में बैठकर एक नीरव संगीत का आनन्द लूटने के लिये अपनी माँ की गोद से उठ-उठकर भाग जाया करता था । प्रेम ने उसके हृदय को आनन्दमय बना दिया था । विरह ने उसके जीवन को करुणामय बना दिया था । उसके मुखमंडल की मुद्रा, उसके नयनों की सजलता और उसकी मौनता के जादू का चित्र इस घड़ी मेरी आँखों के आगे मूर्तिमान हो गया है । अब कुछ करो न प्रजावत्सल ! कि वह गृहासक्त हो, राज-पाट सम्हाल ले ।

राजा :  तन्वी ! मैं सोचता था और सन्तुष्ट हो रहा था कि मेरे हृदय की अग्नि अब शान्त हो गयी है । विश्व की सर्वश्रेष्ठ अनिंद्य सुन्दरी यशोधरा से पाणिग्रहण करा कर उसे रस-पिपासु मिलिंद बनाना चाहा, किन्तु मेरा वैसा सोचना आज व्यर्थ सिद्ध हुआ । सिद्धार्थ चंपक वन का चंचरीक निकला । वह बिना राग के निराला रमता राम हो गया । उसे एक नयी चूमने वाली उमंग, रोमांचित कर देने वाली धारा, पागल बना देने वाली खुशी डँवाडोल कर रही है । सोचा था , यशोधरा की जीवनदायी स्मृति, उसके सुधामय प्रेम का आस्वादन,  उसके जीवन का रस - उसे एक नये रंग में रँग डालेगा । उसके अंग में उमंग भरेगी । आँखों में हँसी उतरेगी, शब्दों में मुग्धता आयेगी । किन्तु मेरा मोहभंग होता चला जा रहा है । उसको देखकर तो मुझे ऐसा अनुभव हो रहा है जैसे वह राजपुत्र ही नहीं है । सदा का भिखारी है, वेदना से विह्वल है ।

रानी  :  ओह ! अब स्मृति में ताजी हो रही है वही बेला आर्य ! जब बालकेलि में आकर अपने हाँथों से मेरी आँखें बन्द कर इठलाने लगता और कहता-
माँ, वह दरवाजा खोल दो ! मुझे डर लग रहा है । मेरे चारों तरफ का जो दृश्य है विषाद मिश्रित हँसी का है । नैराश्यपूर्ण आशा का है । मैं फूल की सुगंध में छिप जाना चाहता हूँ , पर प्रवेश के लिये द्वार ही नहीं सूझता । सुबह की संगीत-धारा में अपने को बहा देना चाहता हूँ, पर अंततः अपने को स्तंभित पाता हूँ । अनन्त आकाश में विचरण करने के लिये उड़ना चाहता हूँ, पर मेरे हाँथ सिर्फ हवा को चीरकर रह जाते हैं । वह प्रवेश द्वार खोल दो ना माँ ! "
राजा :  क्या करूँ गुणमयी ! वह सबों का दुलारा होकर भी उदास है । वह अपनी समस्त आकांक्षाओं को लेकर भी वैरागी है , एक कोमल आनन रखते हुए भी कठोर है । राजधानी सजायी थी उसको रिझाने के  लिये  । दुख, पीड़ा, रोग, वैराग्य, जरा, व्याधि, मरण , विलाप सबको रोक रखने का आदेश दिया था, कि ये राजकुमार के दृष्टिपथ में न आयें । केवल मोद और प्रसन्नता बरसे ।

रानी ! सूर्य अब मध्याह्न व्योम की ओर अग्रसर हो रहे हैं । सारथी आता ही होगा । उसे अभी बुलवाता हूँ । राजकुमार की इस समय क्या स्थिति है, इसे जानने की इच्छा हो रही है ।
(सारथी को बुलाने का आदेश )

अगली प्रविष्टि में जारी ................

November 15, 2009

कल की ना-ना तुम्हारी ....

कल की ना-ना तुम्हारी -
मन सिहर गया, चित्त अस्थिर
आगत के भय की धारणायें,
कहीं उल्लास के दिन और रात झर न जायें

फिर उलाहना -
क्या यह प्रेम प्रहसन ?
रही विक्षिप्त
अंतः-बाह्य के निरीक्षण में व्यस्त,
नहीं दिखी त्रुटिपूर्णा मैं खुद को,

फिर क्षोभ -
नायक या खल-नायक ?
छोड़ गये सारंगी-सा, जिसके
टूट गये हों तार हृदय-से

फिर उपालंभ -
क्या मिली कोई लज्जाहीना ?
अभिव्यक्त देंह से, इंद्रजाल की मलिका
तुम्हें क्या ? यहाँ अनमनी, अश्रु-मुखी
कैसे रहती है ?

फिर अश्रु-अर्घ्य -
"पुकारती रही, किन्तु किंचित शून्य में!
तड़पती हूक, अन्तर का भूचाल,
देंह की धरित्रि का कँपना - देख न सके "

फिर समर्पण -
"पता है -यह तुम्हारी खेचरी मुद्रा!
यदि सहन होगा विरह-दारुण,
सुलभ संयोग होगा स्फूर्तिकर !"
"समझ आया - प्रलय के दृश्य में भी
सृजन हँसता है, विहँसता है ।


फिर यह रहा स्वीकार -
सम्मुख शब्द-मौन,  विश्वस्त-हृदय
अधरों में सम्पुटित अधर,
समाधि में वक्षस्थलों पर स्थित चेतनस्थ कर ।



चित्र : First People से साभार

November 13, 2009

मुक्तिबोध की हर कविता एक आईना है ..



आज ’मुक्तिबोध’ का जन्मदिवस है, एक अप्रतिम सर्जक का जन्मदिवस । याद करने की बहुत-सी जरूरतें हैं इस कवि को । मुक्तिबोध प्रश्नों की धुंध में छिपे उत्तरों की तलाश करते हैं-चोट पर चोट खाकर, आघात पर आघात सहकर । जो उपलब्ध होता है वह है उद्घाटित अन्तर्निहित सत्य । आदमी और आदमी के मन से जुड़ता है इस कवि का संबंध - इतनी गहराई से कि संबंधों की परिभाषा से इतर होता है एक नवीन संबंध का सृजन । चिन्तन और अभिव्यक्ति में एक-सी छटपटाहट, एक-सा आक्रोश, एक-सा संवेदन । मुक्तिबोध को स्मरण करते हुए ’अमृता भारती” के आलेख ’मुक्तिबोध् : सत्-चित्-वेदना-स्मृति’ से एक महत्वपूर्ण अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ --

"मुक्तिबोध की हर कविता एक आईना है - गोल, तिरछा, चौकोर, लम्बा आईना । उसमें चेहरा या चेहरे देखे जा सकते हैं  । कुछ लोग इन आईनों में अपनी सूरत देखने से घबरायेंगे और कुछ अपनी निरीह-प्यारी गऊ-सूरत को देखकर आत्मदर्शन के सुख क अनुभव करेंगे । मुक्तिबोध ने आरोप, आक्षेप के लिये या भय का सृजन करने के लिये कविता नहीं लिखी - फिर भी समय की विद्रूपता ने चित्रों का आकार ग्रहण किया है - आईनों का । ’अंधेरे में’ कविता इस संग्रह का सबसे बड़ा और भयजन्य आईना है ...

....लौटते हुए खिड़की पर कुहरा नहीं होता था - न डिब्बे में एकान्त - बस पटरियाँ बजती रहतीं थीं और यात्रियों की आवाजें - इन सबके बीच मुक्तिबोध की कविता चलती रहती थी-कहीं कोई नहीं टोकता था-कहीं कोई नहीं रोकता था - बस, कविता चलती रहती थी - अविराम ....।"

चित्र : छाया से साभार 

November 12, 2009

मेरे जग प्रिय रखते मुझको (गीतांजलि का भावानुवाद.)

By all means they try to hold me secure
who love me in this world. But it is
otherwise with thy love which is greater than
theirs, and thou keepest me free.

Lest I forget them they never venture to
leave me alone. But day passes by after
day and thou art not seen.

If I call not thee in my prayers, If I keep
not thee in my heart thy love for me
still waits for my love. (Geetanjali : R.N.Tagore)

मेरे जग प्रिय रखते मुझको सब भाँति सुरक्षित बचा-बचा
पर विलग महत्तर प्रीति तुम्हारी मेरे हित स्वातंत्र्य रचा ।

उनमें न कभीं साहस ऐसा मुझको वे एकाकी छोड़ें
डर है कि न मैं भूलूँ उनको मन ही उनसे नाता तोड़े
पर तुम न दीख पड़ते प्रतिदिन बीतता जा रहा नाच नचा-
पर विलग महत्तर प्रीति तुम्हारी मेरे हित स्वातंत्र्य रचा ।

निज पंकिल विनय प्रार्थनाओं में भले न तुम्हें बुलाऊँ मैं
अपने अंतस्तल बीच तुम्हें प्राणेश न भले बिठाऊँ मैं
तव प्रेम तदपि मम प्रेम हेतु पथ जोहा करता रचा पचा -
पर विलग महत्तर प्रीति तुम्हारी मेरे हित स्वातंत्र्य रचा ।
(पंकिल : मेरे बाबूजी )

November 9, 2009

मैं तो निकल पड़ा हूँ.....

मैं तो निकल पड़ा हूँ
सुन्न एकांत-से मन के साथ
जो प्रारब्ध के वातायनों से झाँक-झाँक
मान-अपमान, ठाँव-कुठाँव, प्राप्ति-अप्राप्ति से
आविष्ट जीवन को निरखता है ...

निकला तो अबेर से हूँ
क्योंकि मन के उद्वेग के साथ
अनुभव का ऊहापोह भी था,
विछोह की अश्रु बूँद पलकों पर
झिलमिला रही थी,
और जाने-अनजाने
एक अकिंचन भावना थी,
जो मुझे बाँध रही थी ....

पर,
तुम्हारे अनन्त सौन्दर्य ने
गन्धोच्छ्वासित लीक दी,
मिलन के उत्ताप में
विछोह के अश्रु सूख गये,
तुम्हारे अंक की पुलक अभीप्सा ने
रोम-रोम पुलकित कर दिये ...
मैं निकल पड़ा ।

कैसे कहूँ तुमसे
कि साँझ पक्षी-कलरव की लोरी से
दुलरा चुकी है अंधकार को
(और संझा-सकारे डर लगता रहा है मुझे),
परिमल-सुवासित हवा यौवन के पैरों को
ठहरा दे रही है बार-बार (मैं कैसे चलूँ ),
और पथ का प्रदीप विराग-राग गा रहा है ....

तुम आओ ना !
मुझे अपने घर ले चलो ।